Gulaal – By Ashutosh Jindal

    GULAL हैलोहहत सा लाल कभी नीला उज्जवल आकाश कभी वसुधा सा हैहरा कही ीं रूप पीताम्बर धरा कही ीं सतरींगी माया जैसे, इींद्र का जाल है रींग रींग मेंभेद हैलेहकन, अहमट अभेद्य गुलाल है| नही ींके वल रींगो मेंसीहमत है, हलए अपनेअींदर भाव असीहमत है, कभी धरा पर Continue Reading